Space Station क्या है ? International Space Station क्यों बनाया जाता हैं ?

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Space Station क्या है ? International Space Station क्यों बनाया जाता हैं ? : ISRO ने घोषणा की है कि वे अपने पहले Man Space Mission का Gaganyaan अंतरिक्ष यान की सफलतापूर्वक लॉन्च होने के अगले 5 से 6 सालों के बाद अपने खुद के Space Station को स्थापित करेंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कि खुद का Space Station होना किसी भी देश के लिए कितना महत्व रखता है और अगर आपको भी इस सभी बातो में जाने की इच्छा है  क्योंकि आज हम इन सब चीजों के बारे में बात करने वाले हैं |

Space Station क्या है ?

space station एक ऐसा space में स्थित station हैं स्पेस स्टेशन को orbiter station भी कहा जाता हैं orbiter का मतलब यह होता हैं कि  किसी स्थान के चारो ओर चक्कर लगाना। और यह space station पृथ्वी के चारो ओर चक्कर लगाता हैं इसलिए इसे orbiter station भी कहते हैं। space station एक ऐसा station हैं जिससे earth से कोई space carft जाकर उससे जुड़ सकता हैं इसके आलावा इसमें इतनी क्षमता होती हैं कि इस पर अंतरिक्ष यान उतारा जा सके । जिसे इंसानो की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बनाया गया हैं जिससे की इंसान स्पेस में रह सके | International  Space Station बड़ा है इसी कारण इस Space Station को टुकड़ों में स्पेस में लेके जाना पड़ा |13 साल बाद इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पूरी तरह बनकर तैयार हुआ अब तक का सबसे महंगा प्रोजेक्ट यह स्टेशन बनाने के लिए कुल 10 लाख 50 हज़ार करोड़ का खर्च आया | International  Space Station के आकार की बात करू तो लंबाई 72.8 मीटर है चौड़ाई 108.5 मीटर है  ऊँचाई 20 मीटर है और वजन 419725 किलोग्राम है अब तक स्टेशन ने पृथ्वी के 116720 चक्कर लगाए यह स्टेशन पृथ्वी से 350 से 400 किलोमीटर की ऊॅंचाई पर है  स्पेस स्टेशन भी पृथ्वी की परिक्रमा करता है यह स्टेशन को प्रति का एक चक्कर लगाने में92 मिनट लगते हैं  | और यह स्टेशन एक दिन में 15 चक्कर लगा लेता है और Space Station के  गति 27600 किलोमीटर प्रतिघंटा है |

International Space Station क्यों बनाया जाता हैं ?

Space Station बनाने के कई सारे कारण हैं जैसे कि अनुसंधान, इंडस्ट्रीज, एक्सप्लोरेशन और टूरिज्म लेकिन सबसे पहले स्पेस स्टेशन था उसे खासतौर पर इसलिए बनाया गया था ताकि इस बात की अध्ययन की जा सकी एक लंबे समय तक इंसान के शरीर पर वेटलेसनेस का क्या प्रभाव पड़ता है वेटलेसनेस  यानी कि ऐसी स्थिती जहाँ पर आपको वहाँ पर अपना वजन महसूस नहीं होता है और वैसे भी Space Station को बनाने की जरूरत इसलिए भी कि अंतरिक्ष  यात्री और पृथ्वी को छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर जाएंगे जहाँ पर ग्रैविटी पृथ्वी की तुलना में बहुत ही कम होती है तो वहाँ पर काफी लंबे समय तक उनके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है | और इसलिए हम कह सकते हैं कि इस स्पेस स्टेशन बनाने  का प्रमुख उद्देश्य था ताकि अत्यधिक वैज्ञानिक रिसर्च की जा सके | जो कि पृथ्वी पर उसकी वैज्ञानिक होने की वजह से करना नामुमकिन है और स्पेस में सबसे पहले स्टेशन को स्थापित करने वाले रूस था जो कि उस सोवियत संघ का हिस्सा था | और रूस ने सबसे पहले सन् 1971 में Orbit में अपने Salyut 1 नाम की Space Station  पेश किया था क्योंकि वास्तव में अलमास और संयोग नाम की अंतरिक्ष यान का कॉम्बिनेशन था | जो सबसे पहले स्टेशन Salyut 1 था  उसमें तीन में कम्पार्टमेंट था जिसमें  food एंड Water स्टोरेज,  कंट्रोल स्टेशन और वैज्ञानिक समीकरण शामिल है  और इस पहले Space Station जाने वाला पहला Soyuz  11 का था हालाँकि जब Soyuz  11  का ग्रुप वापिस पृथ्वी की तरफ आ रहा था तब उनके कैप्सूल के डिप्रेस होने की वजह से वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया था |
और फिर इसके बाद सोवियत संघ ने एक और स्पेस स्टेशन को लॉन्च किया जो कि दरअसल Salyut 2 था लेकिन वो Orbit में पहुंचने में नाकाम रहा था | और इसी तरह से Salyut 2 से Salyut 5 स्पेस स्टेशन भी लॉन्च किए गए और जो Salyut  प्रोग्राम का आखिरी स्पेस स्टेशन था यानी के Salyut 7 1982 लॉन्च किया गया था जिसमें ग्यारह लोगों का ग्रुप आठ दिनों तक रह के आया था | और फिर Salyut  प्रोग्राम के साथ अपने दूसरे स्पेस प्रोग्राम को विकसित करना शुरू किया और रूस के बाद किसी दूसरे देश में अपने स्पेस स्टेशन को लॉन्च किया था तो अमेरिका ने अपने Skylab नाम के पहले और एकमात्र स्पेस स्टेशन को 1973 लॉन्च किया था | और फिर उसके बाद रूस ने सन 1986 में  मिल स्पेस स्टेशन को लॉन्च किया | जो कि उस समय में एकमात्र परमानेंट होम की तरह पाया गया लेकिन फिर बाद में Russian Space agency को महसूस हुआ कि वे काफी लंबे समय तक अपने इस Space Station को मेन्टेन करके नहीं रख सकते हैं फिर इसके बाद NASA और Russia space agency दोनों ही अपने स्टेशन को हटाने का फैसला लिया | और फिर एक साथ मिलकर International Space Station यानी की  ISS को विकसित करने पर काम शुरू किया शुरुआत में International Space Station को अलग देशों के सहयोग के साथ विकसित किया जा रहा था लेकिन 1993 में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में 16 देश शामिल हो चूके थे | जिसके बाद 31 October 2000 में आइएएस के पहले ग्रुप लॉन्च किया गया जो कि रूस से था और 14 मार्च 2019 तक अलग अलग देशों के लोग इस स्पेस स्टेशन को विकसित कर चुकें है | बाकी इसके अलावा चाइना भी अपने खुद के Tiangong नाम की स्पेस स्टेशन पर काम कर रहा है जिसको लेकर कहा जाता है कि इससे मल्टिपल टकीग कैपेसिटी होगी यानी इसमें कई सारे अंतरिक्ष यान के लैंड होने की कैपेसिटी होगी और रिपोर्ट के मुताबिक इस परियोजना पर काम 2020 तक पूरा होने की उम्मीद है और चाइना का कहना है कि उनकी स्पेस स्टेशन का इस्तेमाल सिविलियन और सैन्य दोनों  के लिए किया जाएगा | जो भारत के Space Station होगा उसे पृथ्वी के ऊपर 400 किलोमीटर की Orbit भी पर प्लेस किया जाएगा जिसका वजन करीब 20 टन होगा और इसमें करीब पंद्रह बीस दिनों के लिए  रहने की फैसिलिटीज होगी और अगर आप ये सोच रहे हैं कि भारत में आज तक अपने स्पेस स्टेशन पर काम शुरू क्यों नहीं किया तो जैसा कि हमने आपको शुरू में बताया कि इस स्टेशन को बनाने का प्रमुख यही था | ताकि इस बात की अध्ययन की जा सके कि शून्य गुरुत्वाकर्षण के जीवन में इंसान के शरीर की हेल्थ पर क्या असर पड़ता है और भारत ने आज तक कभी भी अपने खुद के अंतरिक्ष यान से इंसान को स्पेस पर नहीं भेजा है और इसलिए भारत को इससे पहले इस Space Station को स्थापित करने की जरूरत नहीं थी | लेकिन भारत 2021 तक अपने पहले मैने स्पेस मिशन का ज्ञान को लॉन्च करने के लिए तैयार है | और इसलिए भारत को भी अब इस शून्य गुरुत्वाकर्षण अध्ययन करने की जरूरत है तो इसलिए उन्होंने भी अपने Space Station को स्थापित करने की योजना बनाई है |और खुद का स्पेस स्टेशन होने का मतलब है एक ऐसे कैपेबिलिटी को हासिल करना जो कि हर कोई आसानी से हासिल नहीं कर सकता है | क्योंकि इसकी मदद से ऐसे कई सारे एक्सपेरिमेंट का भी किया जा सकता है जो कि पृथ्वी पर रहते हुए नहीं हो सकते |

क्या होगा अगर एक एस्ट्रोनॉट अंतरिक्ष में खो गया तो?

अगर कोई एस्ट्रोनॉट धरती से दूर स्पेस में गुम हो जाए तो तो स्पेस एजेंसी जैसे नशा के अपने सेफ्टी प्रोटोकॉल्स जरूर होते हैं जो ध्यान रखते हैं एस्ट्रोनॉट स्पेस में बाहर निकले तो वे अपने स्पेस क्राफ्ट के स्पेस स्टेशन से संपर्क बनाए रखे जैसे अगर कोई एस्ट्रोनॉट International Space Station से किसी भी काम के लिए बाहर निकले तो उन्हें स्पेस स्टेशन से अटैच किया जाता है  26 मीटर लंबे स्टील के बने हुए ब्रिट धागा से लगभग 500 किलोग्राम प्रेशर झेल सकता है | अगर ये चीज़ फेल हो गई और किसी कारण से टूट गयी  एस्ट्रोनॉट यूज़ कर सकते हैं जिसे कहते है  Simplified AID FOR EVA RESCUE का फुल फॉर्म है  ये इमरजेंसी जेट पैक सिस्टम है जो बेसिकली स्ट्रॉस को एक कंट्रोल्ड एक्सटेंशन प्रोवाइड करता है स्पेस में जिससे उन्हें इधर उधर जाने की मोबिलिटी मीलती है | अगर जेट भी फैल हो गया या जो ऐस्ट्रोनॉट उसे संचालित कर रहा है बेहोश हो गया और जेट  को संचालित नहीं कर पा रहे फिर आखिरी उम्मीद सिर्फ यही रहेंगी कि स्पेस स्टेशन के दूसरे मेंबर्स इकट्ठे होके एक रेस्क्यू मिशन शुरू कर सके | ये हमेशा इतना आसान नहीं होगा क्योंकि ऐसा कोई भी अंतरिक्ष यान नहीं है जो इस तरह से स्पेस में घूम हो गए | यह आसान नहीं है  ढूँढने वापस ला सकें तो अगर स्टील का धागा टूट गया जब पास काम नहीं कर रहा है और दूसरे एस्ट्रोनॉट बचा नहीं सके तो वो एस्ट्रोनॉट कहाँ जाएगा इसका जवाब यह है उस क्षेत्र के टूटने वक्त जो बल आकर्षित कर रही थी वो एस्ट्रोनॉट उसी दिशा में आगे बढ़ने लगेगा | ऐसी सिचुएशन में अब स्पेस में गुरूत्वहीन फील करोगे और कितना भी हाथ पैर हिलाना या बल सृजन करने की कोशीश करना बेकार रहेगा आप जिससे भी डायरेक्शन में जा रहे हो उसी डायरेक्शन में और उसी गति में आगे बढ़ते रहेंगे क्योंकि कोई भी एक्सटर्नल फोर्स या डिस्टर्बेंस नहीं होगा | अगर आप में पृथ्वी के अराउंड acceleration है तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण भी आपको Orbit में कैद कर लेगी | और आप भी अर्थ को चांद की तरह Orbit करने लगोगे आप चांद जितनी देर तक नहीं देख पाओगे अगर आपका स्पेससूट सही तरीके से सील है तो आप लगभग आठ घंटे तक ऐसे ही धरती के चक्कर काटते रहेंगे जब तक ऑक्सीजन खत्म हो जाए | कोई रीज़न से स्पेससूट डैमेज हो गया था
आपकी स्पेस की ट्रिप पहले सिचुएशन से कहीं ज्यादा छोटी हो जाएगी | बाहर स्पेस का एक्सपोजर आपको पंद्रह सेकेंड में बेहोश कर देगा और आप का खून बॉईल होने लगेगा क्योंकि बाहर कोई एयर प्रेशर नहीं रहेगा आपके शरीर में बॉलिंग लिक्विड आपको फुला देंगे अपने नॉर्मल आकार से दोगुना ज्यादा और यह सब हो जाएगा सिर्फ कुछ मिनटों की देरी में |
एक और पॉसिबिलिटी हो सकती है अगर आप एक सही एंगल और सही बलों दिशा से पृथ्वी की तरफ बढ़ रहे हो तो आप और से कोलाइड भी कर सकते हो आप नीचे जमीन तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे क्योंकि आपके नीचे गिराना स्पीड इतनी होगी कि आप और पृथ्वी का वातावरण ही पार नहीं कर पाएंगे उतनी स्पीड में आपके शरीर पृथ्वी का वातावरण के बीच तनाव पैदा  होगा जिसे आप जल जाएंगे |

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