Jagannath Rath Yatra | Jagannath Mandir Rahasya Katha [HINDI]

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Jagannath Rath Yatra | Jagannath Mandir Rahasya Katha [HINDI] : बद्रीनाथ रामेश्वरम द्वारका एवं  पूरी इन चारों पुण्य क्षेत्रों को साथ में चार धाम कहते हैं भक्त का विश्व्वासु है कि श्रीकृष्ण भगवान जी निर्वाण प्राप्त करने के पश्चात  आज भी पूरी, उड़ीसा जगह  में बसते हैं बेहती हवा की विरुद्ध दिशा में लहराता ध्वज नगर में कहीं से भी एक समान दिखने वालीं श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र प्रकृति के नियमों के विरुद्ध प्रवाह रहते समुद्र की हवा और कई ऐसी विस्मय करने वाली बातें सच में मजबूत कर देती है यह मानने को कि वे श्रीकृष्ण भगवान जी ही उड़ीसा में उपस्थित पूरी Jagannath Mandir में अपनी मौजूदगी का अहसास करवातें है दरअसल पुरी में Jagannath Mandir कैसी स्थापित हुआ विज्ञान को ही सवाल करने वाले यह मन्दिर के कुछ ख़ास विशेष जानगे |

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Jagannath Mandir Rahasya Katha

Jagannath Rath Yatra और उनके ऐसी विचित्र से विग्रह के पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है और वही रोचक कथा हम आप के लिए यहाँ पर आज लेकर आए हैं तो इस पूरी कथा की सूत्रधार है नारद जी और श्री राधा जी के लिए भगवान से निश्चित प्रेम की पृष्ठभूमि से शुरू होती है Jagannath Rath Yatra  की अद्भुत कथा  शुरु करते हैं एक बार श्रीकृष्ण  सो रहे थे निद्रावस्था में उनके मुख से अचानक निकला राधे पटरानियों ने इसे सुना सद्भाव से वे सोचने लगी कि हम तो प्रभु की इतनी की सेवा करते हैं परंतु उन्हें ज्यादा राधाजी का ही स्मरण रहता है भला राधाजी के साथ प्रभु के प्रेम का ये कैसा रिश्ता है इस प्रकार के अनेक प्रश्न रुक्मणीजी एवं अन्य रानियों के मन में उठने लगी पर उनकी जिज्ञासा को भला कौन शांत करे बहु को सास और ननद याद किया |सभी रोहिणी जी के पास पहुंची उनसे राधा रानी श्रीकृष्ण  की प्रेम और ब्रीज की लीलाएं सुनाने की प्रार्थना की बहु की जीद पर माता ने कथा सुनाने की हामी तो कर दिया रोहिणी जी ने कहा सुनाऊंगी तो सही श्रीकृष्ण या बलराम को इसकी भनक न मिलें इसका प्रबंध कर लो यदि उन दोनों ने ये कथा सुन ली तो वे फिर से चले जाएंगे तुम सब मिलकर भी उन्हें रोक नहीं पाओगे फिर द्वारकापुरी भला कौन चलेगा तब ये तय हुआ कि सभी रानिया रोहिणी जी के साथ एक गुप्त स्थान पर जाएंगे और वहाँ पूर्ण श्रीकृष्ण लीला कथा कही सुनी जाएगी | माता की शर्त के अनुसार वह कुछ और ना ही इसके लिए सुभद्राजी पहरे देगी भाभीयों ने ननद को मनुहार करके इसके लिए मना लिया सुभद्रा जी को आदेश हुआ कि स्वयं श्रीकृष्ण और बलराम भी आए तो उन्हें भी अंदर न आने दिया जाए माता ने कथा सुनानी आरंभ की सुभद्राजी द्वार पर तैनात थी | रोहिणी ने भगवान की शेष लीला का बखान शुरू कर दिया भगवान नवजात शिशु के रूप में लगते थे किस प्रकार की सोते थे कैसे बालसुलभ हठ करती थीं रोहिणी इतने भाव से सुना रही थी जैसे कथा नहीं सब कुछ उसी समय चल रहा हो कथा सुनकर के सुभद्रा जी स्वयं को बाल रूप में अनुभव करने लगी वह किसी नवजात शिशु के जैसी वही द्वार पर पड़ गए | उन्हें कोई होश नहीं रहा थोड़ी देर में श्रीकृष्ण व बलराम वहाँ पर आ पहुंचे सुभद्रा जी देखा पर ऐसे देखा तो कुछ संदेह हुआ बाहर से ही अपनी आध्यात्मिक शक्ति द्वारा माता द्वारा व्याख्या का आनंद लें कर सुनने लगे बलराम जी कथा का आनंद लेने लगे रानिया तो डूबी ही थी भगवान भी विभोर होकर सुध बुध खो बैठे ऐसे विभोर हुए कि प्रतिमा के समान जड़ प्रतीत होने लगे बड़े ध्यानपुर संपूर्ण देखने पर भी उनके हाथ पांव दिखाई नहीं देते थे सुभद्रा जी ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया तभी अचानक देवर्षि नारद का वहाँ प्रवेश हुआ | नारद भगवान इस रुप को देखकर के बड़े आश्चर्यचकित हुए कुछ समय बाद नारद की तंद्रा भंग हुई और प्रणाम करके उन्होंने भगवान से कहा कि प्रभु मेरी इच्छा है मैने आज जो रूप देखा वहाँ आप के भक्तजनों को पृथ्वी लोक पर चिरकाल तक देखने को मिली आप इस रूप में पृथ्वी बात करें नारद जी की बात से बड़ी पसंद हुए और उन्होंने कहा तथास्तु तो में इसी रूप में नीलांचल क्षेत्रों में अपना रूप प्रकट करूँगा आपने इस बालभाव वाले रूप में अंग हीन मुझे देखा है वही मेरा विक् प्रकट होगा आपको धैर्य पूर्वक उसकी प्रतीक्षा करनी होगी भगवान से प्रार्थना स्वीकार ली ये सुनकर के नारद बड़े गदगद हो गए उन्होंने भगवान से पूछा वह भाग्यशाली कौन होगा |जिसे ये अवसर मिलेंगे आप जानते ही है मेरी कमजोरी मेरा कोतवाल है इस बात को यदि ना जाना पाहूं तो में व्याकुल होगा प्रमुखया मे को निकाल के आने तक व्याकुल हूँ भगवान जी की चतुराई पर हँस पड़े भगवान बोले आपको इस स्वरूप के लिए पूर्ण दर्शन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी | मालवीय राज जी इंद्रद्युम्न समुद्र के उत्तर दिशा और महान नदी के दक्षिण दिशा में जगन्नाथपुरी क्षेत्र में भव्य मंदिर का निर्माण करेंगी वह मेरी प्रतिस्पर्धा तो यहाँ तांबा की ना होकर स्वयं कल्पवृक्ष की होगी वहाँ मेरा रूप वही होगा जो आपने देखने की लालसा प्रकट की है  नारद जी का कोतवाल शांत हो गया वे प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति करके अपने लोक को चले गए जगन्नाथपुरी क्षेत्र में इन राजा इन्द्र देव द्वारा भगवान Jagannath Mandir की स्थापना की कथा यही से आरंभ होती है

राजा इन्द्र देव ने एक बार ऋषियों की सभा में पहुंचना और राजा ने ऋषि विद्वानों से पूछा कि सर्वश्रेष्ठ विद्वानों जनों से भरी सभा में मैं एक जिज्ञासा रखना चाहता हूँ ताकि की आपने प्रत्येक  धामओं का सेवन किया है उसे कोई ऐसा धाम बताये जिसके सेवन से बड़े से बड़ा पापी भी निष्कलंक हो जाए जिसके दर्शन से संचित गुणों का नाश नहीं होता जिन क्षेत्रों में प्रवेश मात्र से ही हृदय में नारायण का वास हो जाएगी वहाँ जाने की लालसा है राजा इन्द्र देव प्रश्न से पूरी सभा में शांति छा गयी कोई एक स्थान के बारे में ऐसा निर्णय नहीं कर पाया तभी एक वृद्ध संत उठ खड़े हुए और बोले राजन् आप जगन्नाथपुरी जाएगी वहाँ भगवान नारायण का साक्षात वासे स्वयं ब्रह्मा जी और समस्त देवता नारायण के दर्शन को वहाँ आते है वह रोहिनी कुंड के पास एक कल्पवृक्ष है उस सरोवर में भूल से भी स्नान कर लेने वाला भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है उसमें जगन्नाथपुरी  का ऐसा वर्णन किया कि राजा का मन व्याकुल हो गया और भगवान के दर्शन की उत्कंठा रहने लगी राजा का किसी काम में मन नहीं लगता है तो अंततः वे भगवान के मंदिर में पहुंचे और वहाँ जा कर उन्होंने करुण प्रार्थना की है अगर में आपका सच्चा भक्त हो और अगर मैं निष्ठापूर्वक ऊर्जा पालन किया है और यदि मैं धर्म में पका हो तो आप मुझे दर्शन दे प्रभु महात्मा द्वारा सुनी आप के रूप के दर्शन के बिना यह जीवन व्यर्थ लगता हैं यदि आपके दर्शना देंगे तो मैं प्राण त्याग दूंगा भगवान के सामने प्रार्थना करते हैं आशु बहाती राजा इन्द्र देव हो गयी वेरी निद्रा में चली गयी राजा ने एक सपना देखा और सपने में उन्हें एक देवानी सुनाई दी देवानी उनसे कह रही थी कि तुम्हें एक विशेष कार्य के लिए चुना गया है इसलिए निराशा का भाव त्याग दें भगवान नीलमाधव के जिस विग्रह दर्शन के लिए तुम इतने व्याकुल हो उसकी खोज करो तुम अपनी ओर से प्रयास करें तुम्हें देव की सहायता प्राप्त होगी तुम एक भव्य मंदिर का निर्माण करा उसके लिए उपयुक्त विग्रह की प्राप्ति भी तुम्हें समय आने पर हो जाएंगे इससे सुनकर के राजा अचानक हड़बड़ा करके बैठे और अपनी राज-सभा में जा कर के पुरोहितों मंत्रियों को ये स्वप्न सुनाया राजपुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ वैदिक मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्री गणेश हुआ ताकि राजा इन्द्र देव ने मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई सभी इसमें योगदान देने पहुंचे रात दिन मंदिर के निर्माण में जुट गई कुछ ही वर्षों में मंदिर बन कर तैयार हो गया |जब मंदिर बनकर तैयार हो गया लेकिन भगवान की मूर्ति वहाँ पर नहीं थी तो मूर्ति को लाने की समस्या उनके सामने आयीं राजा फिर से चिंतित होने लगे एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आँखों से आंसू निकल आए राजा ने भगवान से विनती की कि प्रभु के स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूँ इसकी चिंता से व्यग्र हो मार्ग दिखा ये आपने सपने में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा देव विग्रह भी मंदिर देखकर के सभी मुझ पर हंसेंगे राजा दुखी मन से अपने महल चले गए और उस राजा ने फिर से एक सपना देखा सपने में उसे देवानी सुनाई दी कि राजन यहाँ निकट में ही भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह रूप है उस विग्रह के तुम्हारे द्वारा बनाए गए मंदिर में स्थान ही विधि का विधान है वह होकर रहेगा उस दिव्य विग्रह को खोजने का प्रयास करें तुम्हें दर्शन अवश्य मिलेगा इन दो दिन में सपने की बात पुन पुरोहितों और मंत्रियों को बतायी और सभी इसमें शीर्ष पर पहुंचने की प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होती हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा भगवान का विग्रह कहाँ है | इसका पता लगाने की जिम्मेदारी इन चार विद्वान पंडितों को सौंप दी प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर चारों विद्वान चार दिशाओं में निकल पड़े उन चारों में से एक थे | विद्यापति सबसे कम उम्र के थे और भगवान कृष्ण के उपासक थे खुद से खोजते हुए एक जंगल में जा पहुंचे बहुत ही भयावह जंगल था क्योंकि विद्यापति भगवान श्रीकृष्ण के उपासक थे | तो उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगीं प्रमु का नाम लेते वे वन में चले जाते थे जंगल के मध्य में उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया पर्वत के लक्ष्यों से संगीत की धुन जैसे गीत सुनाई पड़ रहा था विद्यापति संगीत के जानकार थे उन्हें वहाँ मृदंग बन्शी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई गई थी ये संगीत उन्हें दिवसाला रहा था ये वाद्य तो गंधर्वों जा रहे हैं या स्वयं देवता समर्थन में सही जगह पहुंचा हूँ ऐसा ही सोचते सोचते हुए आगे की ओर बढ़ेंगे विद्यापति को ये अनुभव करने के बाद जैसे पंख लॉन्ग गए हो वे जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहाँ पर भी निर्मित कर रहे थेविद्यापति दृश्य को देखकर के बड़े मंत्रमुग्ध हुए और सफ़र के कारण थके तो थे पर संगीत से थकान मिट गई उन्हें नींद आने लगी तभी वहाँ पर एक बहुत अन-साधारणसी बात हुई अचानक एक बार की घटना सुनकर विद्यापति घबरा उठे बाघ उनकी ओर दौड़ता आ रहा था बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गई और बेहोश हो कर के वहीं पर गिर पड़े बाद विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था तभी एक स्री ने बोल रुक जा बाघ आवाज़ को सुन कर विद्यापति मौन खड़ा हो गया उसने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाद लौट पड़ा वापसी के पैरों के पास ऐसे लौटने लगा जैसे कोई बिल्ली कुछ कुशोर करके खेलने लगती है बाघ की कमर को प्यार से थपथपाने लगी वह थी वहाँ मौजूद स्री में सर्वाधिक सुन्दर थी वह विलो के राजा विश्व्वासु की इकलौती पुत्री थीं ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा सेविकाओं ने झरना से जल लेकर के विद्यापति पर छिड़का कुछ देर के बाद जब विद्यापति की चेतना लौटी तो यह सब कुछ देखकर वे बड़े आश्चर्य में पड़ गयी ललिता उनके पास आयी और पूछा कि आप कौन हैं भयानक जानवरों से भरे हुए इस वन में आप कैसे पहुंची आपकी आने का प्रयोजन बताइए ताकि वे आपकी सहायता कर सकूँ | विद्यापति  के मन से बाघ भय है पूरी तरह से गय नहीं था ललिता  सांत्वना देते हुए बोली विप्रवर आप मेरे साथ चले जब आप सुस्त हो जाए तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें विद्यापति ललिता के पीछे पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दी है विद्यापति यहाँ पर विलो के राजा विश्व्वासु से भी मिले और विश्व्वासु को उन्होंने अपना पूरा परिचय नहीं दिया और  कहा कि वे श्रीकृष्ण के भक्त हैं वहाँ भ्रमण करके लोगों को भगवान की विशेष ज्ञान देते हैं और उनकी शंकाओं का समाधान करते है विद्यापति में अपना वास्तविक परिचय तब तक छुपाना उचित समझा जब तक वे अपने लक्ष्य पर न पहुँच जाए विश्व्वासु विद्यापति जैसे विद्वान से मिल कर के काफी प्रसन्न हुए परिस्थितियों के चलते विद्यापति और ललिता का विवाह हो गया और कुछ दिन दोनों की सुख में बिता दाम्पत्य जीवन से विद्यापति पसंद था लेकिन उन्हें लगातार एक चिंता सता रही थी कि राजा ने इस कार्य से उन्हें भेजा है वह कार्य अभी तक अधूरा है इसी बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली कि विश्व्वासु एक पहल रात बाकी रहती तभी उठकर कहीं चले जाते थे सूर्योदय के बाद ही लौटे थे कितनी भी विकट स्थिति आया उनका ये नियम कभी नहीं भूलता था ऐसा वह कब से करते आ रहे थे दिलराजा विश्व्वासु  के इस व्रत पर विद्यापति को विरक्त हुआ उसके मन में इस तथ्य को जानने की इच्छा हुई कि आखिर विश्व्वासु जाते कहां है ललिता ने  जब उन्हें परेशान देखा तो उनसे पूछ लिया तब विद्यापति  में ललिता से पूछा कि विश्व्वासु प्रतिदिन कहाँ जाते हैं विकट से विकट परिस्थिति आने पर भी उनका नियम नहीं टूटा ऐसा क्या है पूछे जाने की इच्छा है ललिता के सामने धर्म संकट आ गया वह पति की बात को भी नहीं ठुकरा सकती थी लेकिन पति जो कुछ पूछ रहा था वह बता भी नहीं सकती थी क्योंकि ये उसकी वर्ष की पारिवारिक परंपरा से जुड़ी हुई बात थी ललिता ने कहा कि स्वामी ये हमारे पारिवारिक रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता आप मेरे पति हैं मैं आपको कुल पुरुष मानते हुए जितना संभव है बताओ थी यहाँ से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अंदर हमारी कुल देवता हैं उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं और ये पूजा निर्बाध चलनी चाहिए उसे पूजा के लिए पिता जी रोज़ वह नियमित रूप से वहाँ पर जाते हैं इसके बाद विद्यापति ने बहुत प्रयास करके ललिता को इस बात के लिए मना लिया कि वे उनके कुल देवता के दर्शन को जाएंगे ललिता ने हार कर कह दिया कि मैं अपने पिताजी से विनती करूँगा कि आपको दर्शन करा दे पिता को सब बात बतायी तो वे क्रोधित हो गयी ललिता ने विश्व्वासु  से कहा कि मैं आप की अकेली संतान हो आप के बाद देव कि भोजन के कार्य तो मेरा होगा इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा आप पुत्र और पुत्री में भेद नहीं कर सकते हैं | जमाता को पुत्र समझिए और उसे उसका अधिकार दीजिए विश्व्वासु पुत्री  के आगे झुक गए वे बोले गुफा के दर्शन किसी को तभी कराया जा सकता है जब वह भगवान की पूजा के कार्य अपने हाथ में ले तुम पहली बात जानती हूँ कि मैं विद्यापति को वहाँ पर क्यों नहीं जाने देना चाहता ललिता बोली में जानती हूँ पर विद्यापति अब कोई यात्री नहीं है वे हमारे परिवार के सदस्य हैं वे यही के वासी है इसलिए उनके दर्शन करने से देवता का संकट नहीं आएगा | हमारी कुलदेवता लुप्त नहीं होंगे दूसरी ओर विद्यापति चुप करके पिता पुत्री के बीच की बात सुन रहे थे और लुप्त हो जाएंगे यह सुनकर कि वे अपने कोतवाल को ना रोक सके सामने आ गए देवता के लुप्त होने का क्या रहस्य है उन्होंने पूछा विश्व्वासु ने जब जाना कि विद्यापति ने उसके देवता रहस्य सुन लिया है तो उनका हृदय रद्द कर दिया विद्यापति ने अपने ससुर को विश्व्वासु विश्वास दिलाया कि वह दायित्व को पूरा करेंगे और इसके लिए वह विश्व्वासु  की सौगंध लेने को भी तैयार है यह होने के बाद विश्व्वासु ने उस रहस्य को बताना शुरु किया वे बोले यहाँ देवताओं का प्रतिदिन आगमन होता है और वे अपने साथ विविध प्रकार के नैवेद्य फल फूल आदि लेकर आते हैं हमारी ताकि पूजन करने उनके पूजन में किसी तरह का विघ्न न हो इसके लिए उन्हें चारों तरफ पहाड़ जंगल बना लिया है कोई विघ्न डाले इसके लिए वन में हिंसक जंतुओं है इसी कारण तुम  क्षेत्र में अनुभव सुखद अनुभव हल कुछ प्राप्त होती है जो कहीं और नहीं होती ये देवता के लिए गीत गाते हैं उनके भोजन करने के जाने के उपरान्त में पृथ्वीवासी की ओर से उनकी पूजा करता हूँ उनकी कृपा से ही हमारे सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं हमारे देवता की प्रतिमा ऐसी मनोहर है जो उसे देखता है बस देखता ही रह जाता है एक रहस्मयी प्रतिमा है जिसमें बहुत आकर्षक है और सब के लिए उसे देखना भी संभव नहीं है जो देखले वहीं उसे अपने साथ ले जाना चाहेगा एक बार हमारे पूर्वजों को शंख हुई कि कहीं कोई हमारे देवता की प्रतिमा लेकर तो चला नहीं जाएगा उन्होंने यह आशंका देवताओं के सामने रखे तब देवताओं ने बताया कि कलिकाल में एक राजा इसे यहाँ से ले जाकर कहीं और प्रतिष्ठित करेंगे  प्रस्तान के साथ ही हमारा दुर्भाग्य न जाएं इसलिए किसी को भी दर्शन नहीं करने दिया जाता तुम बाहर से आये हो इसलिए तुम्हें दर्शन से रोक रहा था पर तुमने शपथ ली है तो थोड़ा विश्वास हुआ मैं तुम्हें दर्शन को लेकर तो जाऊंगा पर अभी वह मार्ग नहीं बताऊँगा मेरे जीवन काल तक पूजा अधिकार तो मेरा है और मेरे उपरांत तुम पूजा करोगे पुत्री की जिद के कारण मैं तुम्हें कल आँखों पर पट्टी बांधकर ले जाने के लिए तैयार हो विद्यापति  के मन में आपके कोई संदेह नहीं रहा कि यह वही प्रतिमा है जिसे खोजने के लिए वे निकले थे उनका लक्ष्य पूरा होने को था विद्यापति केवल दर्शन करने तो आये नहीं थे उन्हें प्रतिमा लेकर जाना था इसलिए उन्होंने एक चाल चली दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आँखों पर पट्टी बांधकर विश्व्वासु उनका बायां हाथ पकड़कर चल दिए विद्यापति ने दाहिने हाथ सरसों रख लिया और रास्ते में वह सरसों छोड़ते हुए काफी देर चलने के बाद विश्व्वासुू रुके विश्व्वासु ने विद्यापति की आंखो की काली पट्टी खोल दी वे गुफा के सामने खड़े थे और उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा हाथों में बांसुरी लिए भगवान श्रीकृष्ण का रुप विद्यापति को दिखाई दिया विद्यापति आनंद मग्न हो गए और उन्होंने भगवान के दर्शन किए और उनकी स्थिती की दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे विश्व्वासुू में लौटने का आदेश दिया तो  फिर उनकी आँखों में पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा क्या आपके प्रदेश में भी हमारे कुल देवता जैसी प्रतिमा है क्या आपने ऐसा विग्रह गयी पर देखा है आपने किस नाम से जानते हैं और कैसे पूजाते हैं ललिताने तो प्रश्नों की झड़ी लगा दी पर विद्यापति चुप रहे गुफा में देखें अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना उचित नहीं समझा विश्व्वासु के कुल देवता ही नींल माधव भगवान है अब ये तय हो चुका था महाराज ने सपने में जिसे भगवान के बारे में वाणी सुनी थी  नीलमाधव ही है इसलिए प्रतिमा को लेकर किस प्रकार से राजधानी तक पहुंचा जाए विद्यापति गुफा से मूर्ति लेकर जाने की सोच रहे थे पर फिर राज्य के विश्व्वासघात के विचार से मन व्यथित भी था विद्यापति धर्मोपदेश बारे में सोचते रहे फिर विचार आया कि यदि विश्व्वासु ने सचमुच विश्व्वास किया होता तो आंखो पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाते इसलिए उनके साथ विश्व्वासघात का तो प्रश्न ही नहीं उठता विद्यापति ने गुफा से मूर्ति चुराने का निश्चय कर लिया पिता पत्नी ललिता से कहा कि वह अपने माता पिता के दर्शन के लिए जाना चाहता है वे उसे लेकर परेशान होंगे ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई तब विद्यापति ने यह कहकर समझा दिया कि वे शीघ्र लौटेंगे तो उसे लेकर जाएंगे ललिता मान गयी विश्व्वासु उसके लिए घोड़े का प्रबंध कर दिया अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुँच गया भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद मूर्ति को उठाकर झोली में रख लिया लंबे यात्रा उपरांत वह राजधानी पहुँच गई और सीधे राजा के पास पहुंचे दिन में प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनाइये राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक लकड़ी का कूंदा बहेकर आएगा उस कूंदा की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश  प्राप्त होने वाला है वह भगवान शिव विष्णु का स्वरूप होगा तुम इस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान शिव का अंश है दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गयीं राजा ने कहा जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का बड़ा प्रतिमा बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिल कर उन्हें प्रतिमा वापस कर देना उनके कुल देवता का विशाल विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी होगी दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर वे सागर तट पर पहुंच और सपना के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहेकर आ रहा था तभी उसे देखकर प्रसन्न हुए दस नाव पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदा को खींचाना पहुंच मोटी मोटी रस्सियों से कुंदा को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस न हुआ और लोग भी जगह सैकड़ों लोग और नाव का उपयोग करके भी कुंदा को हिलाया नहीं जा सका राजा का मन उदास हो गया सेनापति ने एक लंब सेना  कुंदा को खींचने के लिए भेज दिया सभी ने बहुत प्रयास किया पर उस कुंदा को अपने साथ नहीं ला सके तब राजा इन्द्र ने कहा कि भगवान का विग्रह बन जाएगा एक काम करना होगा जिसे किसी ने इस विग्रह की अब तक पूजा की है उसे तुरंत क्षमा मांगनी होगी बिना उसके स्पर्श किए ये कुंदा आगे नहीं बढ़ सकेगा राजा इन्द्र और विद्यापति विश्व्वासु से मिलने पहुंच और वहाँ की सुंदरता को देखकर वे दोनों आश्चर्य चकित हो गयी इधर विश्व्वासु को अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुल देवता की पूजा के लिए चले तब वहाँ प्रभु की मूर्ति गायब दिखी तो वे समझ गए कि उनके दामाद ने ही उनके साथ छल किया है विश्व्वासुू लौटे और ललिता को सारीं बात सुना दी है ये बात सुनकर के दोनों दुखी हुईं पिता पुत्री दिन भर विलाप करते रहे दोनों अनहोनी की आशंका से चिंतित थे उन्हें ऐसा लग रहा था कि उनके कुल का नाश हो जाएगा सारा दिन विलाप करते ही निकल दिया और दोनों विलाप करते करते बेसुध से हो गयी अगली सुबह विश्व्वासु उठे और सदा की तरह दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले  वे जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहाँ नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की तरफ खिंचे चले जा रहे थे विश्व्वासु के पीछे ललिता और उनके पीछे सारे रिश्तेदार भी चल रहे थे विश्व्वासु गुफा के भीतर पहुंचे जहाँ भगवान जो की विग्रह  होती थी और उस चट्टान के पास हाथ जोड़कर खड़े रहे फिर उसे ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख बिलख कर रोने लगे वहाँ पर उपस्थित बाकी के सभी भी रोने लगे इतने में एक भी युवक भागता हुआ गुफा के पास आया और उसने बताया कि महाराज और उनके साथ विद्यापति बस्ती की ओर आ रहे हैं यह सुनकर के सभी चौंक उठे विश्व्वासु राजा के स्वागत में गुफा के बाहर आए लेकिन उनकी आँखों में आंसू थे तथा इंद्रद्युम्न विश्व्वासु उनके पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया | राजा बोले तुम्हारे कुलदेवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूँ उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया सुनना के सभी चौंक उठे विश्व्वासु राजा को आसान दिया और राजा ने उन्हें शुरु से लेकर के आखिरी तक की सब कहानी बताई इसके बाद राजा ने विश्व्वासु से प्रार्थना की कई पीढ़ियों आपके कुल के लोग भगवान की मूर्ति को पूजात है भगवान की उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहता हू ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदा बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरक्षित रखना चाहते हैं अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो उसको देखो तुम स्पर्श करोगे तभी  हिलेगा विश्व्वासुू राजी हो गए राजपरिवार को लेकर वे सागर तट पर पहुंच और वहाँ पर विश्व्वासु ने कुंदा को छुआ कुंदा को छूते ही वह खुद आपने आप तैराते हुए किनारे पर आ गया | राजा का सेवक को  उसी राजमहल पहुंचा दिया और अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा कि आखिर इस कुंदा से कौन सी मूति॔ बनाना शुभदायक होगा मूर्तियांकारो ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्ति या तो बनाना जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्तियां बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं है फिर एक नया समस्या पैदा होने से राजा फिर से चिंतित हो गई है आप उन भगवान का स्मरण करने लगे तब भगवान से प्रेरणा ली कि तुम इसकी चिंता छोड़ो तुम्हारे पास एक योगी पधारेंगे वहीं इस मूर्ति का निर्माण कर सकेंगे वें नियम के बड़े पक्के हैं तुम्हे मान देना और अपने वचन को मत भूलना अगले दिन एक वृद्ध व्यक्ति राज्यसभा में आया और बोला कि मैं जानता हूँ कि कौन सी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए वह प्रतिमा भी बना होगा और आप भगवान शिव खुश हो उनके भाई बलराम तथा बहन सुभद्रा के साथ यहाँ पर विराजमान करें इस देवीयों का यही संकेत है राजा को वृद्ध व्यक्ति की बात से सांत्वना मिली उसे भगवान का सपना याद आया  राजा ने पूछा कि आखिर मूर्ति बनेगी कैसे उस वृद्ध ने कहा कि मैं इस कला में कुशल हो मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूँगा और मुख्य मूर्ति लेकिन मेरी एक शर्त है मैं भगवान की मूर्ति का निर्माण का काम एकांत में करूँगा मैं ये काम बन्द कमरे में करूँगा कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोलकर बाहर आऊंगा इस बीच कोई मुझे न तो बुलाके न मेरे पास आएं यदि किसी ने बीच में बाधा की तुम्हें अपना काम अधूरा छोड़कर लुप्त हो जाऊंगा जब तक निर्माण कार्य चलें बाहर संगीत बजना चाहिए ताकि वे कार्य की सूचना किसी को नहीं लगे मेरे औज़ारों के चलने की आवाज़ महल के बाहर न जाएं इसकी व्यवस्था कर दीजिए राजा को सहमत थीं लेकिन उन्हें चिंता हुई राजा बोले यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसे की हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी शिल्पी ने कहा जब तक मेरा काम पूरा नहीं होगा तब तक मैं कुछ नहीं खाऊंगा पियूंगा राजमंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बुरे शिल्पी ने स्वयं को 21 दिन के लिए बंद कर दिया बाहर वादक वाद्ययंत्र बजने लगे तो मूर्ति निर्माण का कार्य आरंभ हुआ भीतर से औज़ारों के चलने की आवाजें आती रहीं महारानी गुड़िया देवी दरवाजे कान लगाकर अक्सर छेनी हथोड़े चलने की आवाज सुना करती थीं महारानी रोज़ की तरह कमरे के दरवाजे कान लगाए खड़ी थी पंद्रह दिन बाद. बाद उन्हें कमरे से आवाज सुनाई बंद हो गयी जब मूर्तिकार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गयी उन्हें लगा वृद्ध आदमी है खाता पीता भी नहीं की उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो जाएं रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खुला और भीतर जाकर देखा महारानी गुड़िया देवी ने इस तरह मूर्तिकार को दिया वह अपना वचन भंग कर दिया मूर्तिकार मूर्ति बना रहा था परंतु रानी को देखते ही अदृश्य हो गया मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था भगवान के हाथ पैर अभी नहीं बन सकते थे राजा और रानी दोनों म्लान करने लगे उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया था तो ईश्वर ने उनके हृदय में प्रेरणा दी कि तुम भी चिंतित हो रहे हो जो शिल्पी आई थीं वे स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे जिन प्रतिमाओं को तुम अपूर्ण समझ रहा हो वास्तव में वैसी ही प्रतिमा स्थापित होनी थी मैने नारद को यह वरदान दिया था नारद भी इतने समय से तुम्हारे बीच ही गोपनीय रूप में उपस्थित है नारद दर्शन देकर सारा रहस्य से बता गया अब तुम ध्यान से वह विधि सुनो जिसे करके ही प्रांतस्था करना हैनीलांचल पर 100 कुआं बनाना 100 यज्ञों का आयोजन करो क्योंकि जल से मेरा अभिषेक हो गया  और उसकी उपरांत इसकी स्थापना स्वयं ब्रह्मदेव करेंगे वहाँ तुम्हें लेकर नारद  जाएंगे राजा ने नीलाचल पर्वत पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया ऐसा विशाल मंदिर उस समय भूलोक पर नहीं था भगवान के बताए अनुसार नारद  प्रकट हुए और भगवान की इच्छानुसार वहाँ राजा इन्द्र को लेकर कि ब्राह्मण लोक की ओर चले गए राजा इन्द्र देव ने समय की गति से चल कर ब्राह्मण लोक पहुंच ब्रह्मा जी की स्तुति के बाद उन्हें भगवान की कई बातें बताई तब ब्राह्मण यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए और सौभाग्य मान कर वह इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए ब्राह्मण ने कहा तुम आगे चलो में पीछे से आऊंगा लेकिन इस बात का ध्यान रखना जब तक तुम वापस जाओ गए तब तक धरती पर बहुत कुछ बदल चुका होगा तुम्हारी कई पीढ़ियां बीत गयी है हजारों वर्ष भी जा चूके हैं इसलिए इस समय में मत रहना ब्राह्मण जी से विदा लेकर इंद्र के साथ पृथ्वी पर आये अब वहाँ राजा कला का राज्य स्थापित हो चुका था जो मंदिर विश्व्वासुू बनाया था उसका अधिकांश अंश लुप्त हो गया था इनमें पूजा की तैयारी शुरू की राजा कला को लगा कि कोई उसकी राज्यों में अभिग्रहण करने आया है वह अपनी सेना लेकर चढ़ाया पर जब दृष्य देखा तो विनीत हो गया पूर्व से निकालकर एक संवाद कलशों में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक आरंभ हुआ भगवान ने नारद जी को वचन दिया था कि वह एक साधारण बालक की तरह अपनी लीला करके उन्हें आनंदित करेंगे इसलिए भगवान ने लीला आरंभ की इतने स्नान से भगवान को सर्दी लगी भगवान का पंद्रह दिन का विशेष उपचार किया गया था तब वे जाकर बलराम और सुभद्रा के साथ सवस्थ हुए भगवान श्रीकृष्ण बलराम और सुभद्रा जी के बिना हाथ पैर वाली मूर्तियां इसी कारण ऐसी है |

Spirit का अनुभव क्या होता है? अपनी Spirit को जाने IN HINDI

Jagannath Rath Yatra

 हिंदू धर्म के चार पवित्र स्थानों में से एक है जहाँ आज भी प्राचीन कथाओं की झलक मौजूद हैं भारतीय शहर पुरी प्रत्येक वर्ष भारत की एक Jagannath Rath Yatra की तैयारी करते है यह वह समय होता है जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन एवं भाई के साथ तीन विशाल रथों पर सवार होकर यात्रा करते हैं यह वही समय जब दो लाख की आबादी वाला पुरी  देखते ही देखते दस लाख से अधिक लोगों का शहर बन जाता है और शुरू होता है धरती के सबसे बड़े उत्सवों में से एक यह एक ऐसा उत्सव है जिसमें हिंदू सभ्यता संसकृति संगीत रंगों  इतिहास अथवा गाथाओं का संगठन एक साथ दिखाई बनत हैं  Jagannath Rath Yatra की कहानी पुरी वह जगह है जहाँ प्राचीन काल से लोग खिंचे चले जाते थे पुरी में भगवान विष्णु का वास माना जाता है जो जगन्नाथ भगवान के रूप में प्रसिद्ध है क्या आपको पता है कि पूरी को श्रीपुरुषोत्तम धाम भी कहा जाता है भारत के चार पवित्र धाम पूरे बद्रीनाथ महेश्वर और द्वारका है जहाँ हर साल हज़ारों लाखों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं हिंदुओं में तो यह मानना है कि जीवन में एक बार इन चारों धामों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए पुरी की रथयात्रा  केवल भारत में बल्कि विश्व में प्रसिद्ध है जिससे यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा एवं भाई बलराम के साथ यात्रा पर निकलते हैं ये यात्रा उनके निवास स्थान Jagannath Mandir से तीन किलोमीटर की दूरी तय कर पुण्य के  मंदिर जाती हैं  इस यात्रा की एक झलक पाने के लिए विश्व से पूरी की और आगमन होता है Jagannath Rath Yatra  की तैयारी के लिए पूरी में दो महीने पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती है जिसमें सबसे अहम तैयारी होती हैं Rath निर्माण की जो आजकल के आधुनिक गति से नहीं बल्कि हाथ से पुरानी कला से ही निर्माण किया जाता है कारीगर को यह सभी को उनकी पीढ़ियों से ही विरासत में प्राप्त होते हैं जिसके कारण उन्हें विशाल रथों के निर्माण में कोई समस्या नहीं है पूरे रथ का निर्माण हाथ से लकड़ी की सफाई कर बनाया जाता है तो भगवान जगन्नाथ का मंदिर पारिस्थितिक है जो चार लाख स्क्वायर फिट से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ मंदिर के चारों ओर ऊंची दीवारें भी है और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा  कि भगवान के मुख्य मंदिर की उचाई लगभग 200 feet है मुख्य मंदिर के आसपास छोटे बड़े तीन अन्य मंदिर भी है जिसमें हिंदू धर्म के अलग अलग देवी देवता मंदिर के ठीक ऊपर अष्टधातु से बनी चक्कर भी है जिसे नीलचक्र भी कहते हैं यह चक्र भगवान शिव विष्णु सुदर्शन चक्र का ही प्रतीक माना जाता है ऐसा कहा जाता है कि भगवान के मंदिर पर इनके होने से कभी भी इस मंदिर पर बिजली गिरी | इस चक्र पर प्रत्येक दिन नया ध्वजा  फहराया जाता है जिसके लिए प्रत्येक दिन एक सेवक आस्था के साथ ही लगभग दो सौ फिट की उचाई आसानी से बदलता है इस मंदिर में सदियों से तीर्थ यात्रा का आगमन होता रहे हमेशा बहुत कम लोगों को यह मालूम नहीं होगा कि इस मंदिर में आज हम बिल्कुल मुफ्त दर्शन कर रहे हैं उसमें कभी सत्रहवीं शताब्दी के दौरान तीर्थ यात्रा टैक्स था जो उड़ीसा सरकार के खजाने में पैसे जमा करने का एक स्रोत था हैं इस मंदिर में केवल हिंदू की एंट्री होती है यह मान्यता भी सदियों पुरानी है इसकी एक अन्य हिंदुओं के अलावा किसी अन्य धर्म के व्यक्ति की एंट्री में टूरिस्ट अट्रैक्शन समझा जाता है इसलिए यहाँ केवल हिंदू की एंट्री रखी गई है जिससे इस मंदिर में केवल दर्शन के लिए ही लोगों का आगमन हुआ जब Jagannath Rath Yatra  तैयार  होते हैं तो 40 feet की उचाई के बराबर ही होता हैं आश्चर्य की बात यह कि इस विशाल देश में केवल लकड़ी का का प्रयोग होता है दो महीने तक तीन अलग अलग  रास्तो पर लगातार काम करती रहती है ताकि समय पर तैयार हो सके Jagannath Mandir की रसोई भी Jagannath Mandir की तरह ही काफी विशाल हैं जो लगभग लम्बी और एक सौ 50 feet चौड़ी है भगवान जगन्नाथ के भोग के लिए जो भोजन तैयार किया जाता है उसके लिए फांसी की बाजार से सब्जियां मंगाई जाती है जिससे बाजार का नाम लक्ष्मी बाज़ार भगवान जगन्नाथ को 56 प्रकार के भोग लगाए जाते हैं जिसे बनाने के लिए 1000 से अधिक बर्तन और सिर्फ पुराने जमाने की लकड़ी जलाने की तकनीक का ही प्रयोग किया जाता है सभी भोजन मिट्टी के बर्तन में ही बनाया जाता है जिसे केवल एक बार प्रयोग में लाया जाता है जब यह महाप्रसाद तैयार हो जाता है तो सबसे पहले इसे भगवान जगन्नाथ को परोसा जाता है इसके बाद देव और इसके बाद यह महाप्रसाद माना जाता है मंदिर आने वाले श्रद्धालु बिना महाप्रसाद मंदिर से नहीं जाते इस रसोई से प्रतिदिन लगभग लोगों के लिए भोजन तैयार होते हैं दोस्त Jagannath Mandir में प्रवेश के लिए चार द्वार हैं जिन पर बारीक नक्काशियों से सजावट भी की गई है Jagannath Rath Yatra  के दौरान 25 पुलिसकर्मी और 150 traffic पुलिसकर्मी  नियुक्ति किए जाते हैं जिससे वे भक्तों की सुरक्षा एवं किसी भी असाधारण गतिविधियों होने से रोक सके रथयात्रा आरम्भ होती है चारो और भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है सभी अपने भगवान की एक झलक पाने के लिए कोशीश करते हैं आश्चर्यजनक बात यह है कि मात्र तीन किलोमीटर की यात्रा संपन्न होने में करीब पांच घंटे का समय लगा है आखिरकार ओडिशा मंदिर पहुंचते हैं पहुँचकर भगवान की मूर्तियों को मंदिर में लाया जाता है जहाँ सात दिन तक भगवान उस मंदिर में रहते हैं और उसके बाद वे अपने निवास Jagannath Mandir लौट आते हैं |

Jagannath Rath Yatra के अनसुने राज

  1. मंदिर के ऊपर झंडा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है |
  2.  किसी भी स्थान से एक मंदिर पर लगे सुदर्शन को देखेंगे तो आपको अपने सामने ही लगा दिखेगा |
  3. आम तौर पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है |
  4. पक्षी और विमान को मंदिर के ऊपर उठते हुए नहीं देख पाएंगे |
  5. मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य रहती है |
  6. मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रख है प्रसाद के एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है |
  7. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे पर रखी जाती है और सब कुछ लकड़ी पर मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है और फिर क्रमश नीचे की तरफ एक के बाद एक पका जाती है |
  8. मंदिर में पहला कदम रखने पर आप समुद्र के सुन नहीं सुन सकते लेकिन बाहर आने पर इसे सुन सकता है |
  9. मंदिर के रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर है |
  10. प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वजा के मानव द्वारा उलटा चढ़कर बदला जाता है |
  11. मंदिर  क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फुट में है मंदिर की उचाई दो सौ चौदह फुट है |

Jagannath Rath Yatra 2020 की तारीख व मुहूर्त

जून 22, 2020 को 12:01:02 से द्वितीया आरम्भ
जून 23, 2020 को 11:21:05 पर द्वितीया समाप्त
Jagannath Rath Yatra 2020 की तारीख व मुहूर्त। पुरी (उड़ीसा) में इस यात्रा का विशाल आयोजन हर वर्ष किया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, पुरी Jagannath Rath Yatra हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है।

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